दरअसल, राष्ट्रपति की तरफ से नई सरकार गठन के बाद पहले ही स्पष्ट कर दिया गया था कि विधेयक संसद में पारित न होने की सूरत में अध्यादेश लाने की जरूरत और प्रासंगिकता पर वह विमर्श जरूर करेंगे। सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसी समय व्यवस्था कर दी थी कि यदि अध्यादेश लाने की जरूरत पड़ती है तो संबंधित मंत्री राष्ट्रपति को खुद जाकर उसकी बारीकियों से अवगत कराएगा। प्रणब मुखर्जी पूर्ववर्ती संप्रग सरकार के संकटमोचक और पूर्व वित्त मंत्री भी रहे हैं। वकील होने के साथ सरकारी फैसलों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही है।
इसलिए, राष्ट्रपति बनने के बाद से ही वह रूल-बुक के हिसाब से चल रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी राष्ट्रपति के प्रशंसक रहे हैं और उन्हें कई सार्वजनिक भाषणों में कुशल राजनेता और काबिल व्यक्ति करार देते रहे हैं। लिहाजा, सरकार और राष्ट्रपति भवन के बीच केमेस्ट्री ठीक रखने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय और राष्ट्रपति भवन दोनों ही कोई कसर नहीं छोड़ते। कोयला और बीमा अध्यादेशों या अन्य पर सरकार के संबंधित विभाग के मंत्री पहले ही राष्ट्रपति को जाकर पक्ष समझाते रहे हैं। मगर भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर सरकार की तरफ से राष्ट्रपति से चर्चा नहीं हुई।
Source: Hindi News and Newspaper
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