Wednesday, 15 January 2014

Impossible to discharge resolution, alternative target

वाराणसी। गंगा में कपड़े न धोए जाएं इसके लिए रजक समुदाय को दिलाए गए संकल्प से उन्हें मुक्त नहीं किया जा सकता है। ऐसे में अब एकमात्र रास्ता विकल्प का बचता है। 

रजक समुदाय चूंकि जन-जन से जुड़ा है इसलिए उनके लिए विकल्प के तौर मुहैया कराए जाने वाले धोबी घाटों के निर्माण हो रहे विलंब के खिलाफ खड़ा होना पड़ेगा। जरूरत पड़ी तो विद्वत समाज भी रजक समुदाय के संकल्प बद्धता को बनाए रखने और गंगा को प्रदूषण से बचाए रखने की दिशा में जन आंदोलन खड़ा करने में जुटेगा। यह निचोड़ निकला है तीन दिनों तक केदारमठ में चले काशी विद्वत परिषद के मंथन से। अंतिम निर्णय की घोषणा पूर्णिमा अर्थात 15 जनवरी को की जाएगी।

मंथन के अंतिम दिन जुटे विद्वानों ने एक स्वर कहा कि संकल्प मुक्ति किसी भी दशा में संभव नहीं है। यह शास्त्र सम्मत भी नहीं है। और बात जब गंगा के निर्मलीकरण से जुड़ी हो तो कत्तई कहीं कोई गुंजाइश नहीं है। दूसरी ओर रजक समुदाय की विवशता यह है कि वह संकल्प लेने के बावजूद विकल्प के अभाव में गंगा की धारा में मैले कपड़े धोने को विवश हैं जिसके चलते उन्हें आत्मग्लानि महसूस हो रही है। गंगा और लोकहित में अब यह जरूरी हो गया है कि किसी भी सूरत में रजक समुदाय को प्रस्तावित धोबी घाटों का विकल्प मुहैया कराया जाए। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद के प्रतिनिधि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने तीन दिवसीय बैठक की अध्यक्षता करते हुए कहा कि बनाए जाने वाले धोबी घाटों में हो रहे विलंब के लिए जिला प्रशासन और सरकारों से वार्ता होगी। जन-जन को जोड़ते हुए जरूरत पड़ी तो इसके लिए आंदोलन की राह भी पकड़ी जाएगी। किसी भी सूरत में रजक समुदाय को उनके संकल्प पूर्ति के लिए मदद किया जाएगा और गंगा को और मैली होने से बचाने का प्रयास जारी रहेगा। बैठक में प्रो. रामयत्‍‌न शुक्ल, प्रो. वशिष्ठ त्रिपाठी, डा. श्रीप्रकाश मिश्र, प्रो. रमाकांत पांडेय, प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी, प्रो. शिवपूजन मिश्र, आचार्य रमाकांत पांडेय, आचार्य अवधराम पांडेय आदि सहित जिला धोबी घाट बचाओ संघर्ष समिति के अध्यक्ष नंदू कनौजिया व अन्य सदस्य प्रमुख रूप से मौजूद रहे।

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