Monday, 6 January 2014

Idolatry means contemplation of Swami Vivekananda ...

जब तक हम सूक्ष्म को मन में नहीं ग्रहण कर पाते, तब तक हमें मूर्तियों के सहारे ही उपासना करनी होती है। मूर्तिपूजा को लेकर विवाद पैदा करना उचित नहीं। स्वामी विवेकानंद का चिंतन.. 
यदि कोई कहे कि प्रतीक, अनुष्ठान और विधियां सदैव रखने की चीजें हैं, तो उसका यह कहना गलत है, पर यदि वह कहे कि इन प्रतीकों और अनुष्ठानों द्वारा विकास की निम्न श्रेणियों में आत्मोन्नति में सहायता मिलती है, तो उसका कथन ठीक है। पर हां, आत्मोन्नति का अर्थ बुद्धि का विकास नहीं। किसी मनुष्य की बुद्धि कितनी ही विशाल क्यों न हो, पर आध्यात्मिक क्षेत्र में संभव है वह एक बालक या उससे भी गया-बीता हो। इसी क्षण आप इसकी परीक्षा कर सकते हैं। हममें से कितने ऐसे हैं, जिन्होंने सर्वव्यापित्व की कल्पना की है? हालांकि हम लोगों को सर्वव्यापी ईश्वर में ही विश्वास करना सिखाया गया है। यदि आप प्रयत्न करेंगे तो सर्व-व्यापकता के भाव के लिए आकाश या हरे-भरे विस्तृत मैदान की या समुद्र अथवा मरुस्थल की कल्पना करेंगे। पर ये सब भौतिक मूर्तियां हैं, जब तक आप सूक्ष्म को सूक्ष्म की ही तरह मन में नहीं ग्रहण कर सकते, तब तक इन आकारों के मार्ग से, इन भौतिक मूर्तियों के सहारे ही चलना होगा। फिर ये मूर्तियां चाहे दिमाग के भीतर हों या बाहर, उससे कोई अंतर नहीं पड़ता।

मूर्तिपूजा मानव-प्रकृति की बनावट के अंतर्गत है। उसके परे सिद्धपुरुष ही जा सकते हैं। जब तक आप अपने सामने अनेक रूप और अनेक आकृतियों सहित इस संसार को देख रहे हैं, तब तक आप सभी मूर्तिपूजक हैं। दिमाग में स्थूल मूर्तियां नहीं समातीं, वहां तो किसी स्थान पर थोड़ा सा स्फुरण ही हुआ करता है। पर फिर भी आप इस अनेक रंग-रूप और आकारयुक्त संसार की, इस महान प्रतीक स्वरूप संसार की मूर्ति किस तरह अपने सामने ले आते हैं? क्या आप एक विशालकाय मूर्ति की उपासना नहीं कर रहे हैं? जो व्यक्ति कहता है कि मैं शरीर हूं, वह जन्मत: ही मूर्तिपूजक है। असल में हम सब तो आत्मा हैं। वह आत्मा जिसका न कोई रूप है, न रंग। जो अनंत है, कोई भौतिक पदार्थ नहीं। अत: जो व्यक्ति अपने को शरीर या जड़ पदार्थ समझता है, सूक्ष्म को ग्रहण करने में असमर्थ है तथा भौतिक पदार्थ की सहायता के बिना अपने वास्तविक स्वरूप को सोच नहीं सकता, उसे तो हम मूर्तिपूजक ही कहेंगे। फिर भी ऐसे लोग दूसरे से आपस में लड़ा करते हैं। मतलब यह है कि हर एक व्यक्ति अपनी उपास्य मूर्ति को सच्चा बताता है और दूसरों की उपास्य मूर्ति को गलत। इसलिए आध्यात्मिक क्षेत्र में जो लोग बच्चों के समान हैं, उनके इस तरह के विचारों को हमें दिमाग से दूर कर देना चाहिए।

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