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Monday, 8 December 2014

Teachers banned from using cellphones in Rawalpindi

To ensure implementation of the ban, principals have been directed to collect mobile phones from all teachers in the morning assembly and return them at the end of school hours, a newspaper reported citing from the Rawalpindi education department's directives.

Authorities said the decision was taken to prevent wastage of time by teachers during school hours.

"We have taken the decision as there were reports that teachers were wasting time on mobile phones during school hours," said District Education Officer (EDO) Qazi Zahoor ul Haq, adding: "The violators of the ban can face suspension."

The official said earlier the department had tried to check the use of mobile phones in classrooms but majority of the teachers did not take the directives seriously."We were left with no other option but to direct the principals to collect mobile sets  from the teachers at the assembly time."

Saturday, 21 June 2014

Help pours in for Mumbai bus driver's twins who cracked IIT-JEE

Ramashankar Yadav flanked by his sons Ram (right) and Shyam (left). The brothers said they will ensure that they deliver on the trust reposed in them. File pic
Their father may not be able to comprehend the scale of his sons’ achievement, but the rest of the world certainly has. The day mid-day reported about 18-year-old twins Ram and Shyam, sons of bus driver Ramashankar Yadav, who have passed the JEE Advanced exams but are struggling to fund their education with their father’s meagre Rs 8,000 salary, help began pouring in from all corners.

Institutes, corporate houses and individuals from across the country called up the twins as well as mid-day yesterday and offered to help fund their education. “People from our management read about the brothers and we are very keen on helping them.
Both boys seem to be doing really well academically and lack of funds should not be a hindrance,” said Meera Isaacs, principal of Cathedral & John Connon School in Fort. Similarly, many other people contacted the mid-day office in order to touch base with the boys and help them monetarily.

“I have been receiving calls all day and I can’t imagine how so many strangers agreed to trust us and fund our education. My father was worried that we would have to give up on our dream since we couldn’t afford the fees. I am so happy that there are so many angels who have come to our rescue,” said Ram Yadav, one of the brothers.

“My parents, who only knew that we had passed an exam and did not know the importance of IIT JEE, are still not sure what is happening. All they know is that we can continue our studies now, and this has made them very happy,” added Ram.
Will power

Residents of Bhiwandi, both boys managed to score well in their class X and XII board exams without the help of any coaching classes. Their IIT-JEE entrance exam training was thanks to a 100% scholarship provided by FIITJEE based on an aptitude test.

Both brothers want to pursue their education at one of the Indian Institutes of Technology (IITs) and take up research in particle physics and space. “We will work very hard to make sure that we make everybody who has trusted us proud of our work and achievements,” said Ram.

Source: Hindi News

Wednesday, 13 November 2013

Azim Premji Tops Philanthropy list with Donation of Rs 8K CR

azim premji
मुंबई। एक समय दान-पुण्य पर कम यकीन रखने वाला भारतीय कॉरपोरेट जगत अब अपने कुछ दानवीरों की बदौलत दुनिया में यशोगान का हकदार बन रहा है। देश में ऐसे दानदाताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है जो अपनी संपत्ति सामाजिक कार्यो पर न्योछावर कर रहे हैं। ऐसे भारतीयों की सूची में विप्रो के प्रमुख अजीम प्रेमजी शीर्ष पर हैं। वहीं एचसीएल के शिव नाडर देश के दूसरे सबसे बड़े दानदाता हैं।

चीन स्थित हुरुन रिपोर्ट इंक ने अपनी हुरुन इंडिया परोपकार सूची 2013 जारी की है। बीते वित्त वर्ष 2012-13 में 8,000 करोड़ रुपये की रकम सामाजिक कार्यो में लगाने वाले प्रेमजी को इस सूची में सबसे शीर्ष स्थान मिला है। अमेरिकी दिग्गज दानदाता बिल गेट्स की तरह सामाजिक कार्यो पर बड़ी धनराशि न्योछावर करने वाले लोगों की संख्या अब भी भारत में कम है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि भारतीय कॉरपोरेट जगत में ऐसे लोग बिल्कुल नहीं हैं। हुरुन सूची में दूसरा स्थान हासिल करने वाले एचसीएल चेयरमैन शिव नाडर ने बीते साल 3,000 करोड़ रुपये परोपकार में लगाए हैं। नाडर की शिव नाडर फाउंडेशन पिछले 20 साल से शिक्षण संस्थाओं का विकास और संचालन कर रही है। अब तक यह संस्था पूरे देश में 15,000 करोड़ रुपये की रकम सामाजिक कार्यो में लगा चुकी है। 

हुरुन इंडिया की सूची में ऐसे 31 भारतीयों को शामिल किया गया है, जिन्होंने मार्च 2012 से अप्रैल 2013 तक 10 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम सामाजिक कार्यो पर खर्च की। इस सूची में जीएमआर समूह के प्रमुख जीएम राव तीसरे स्थान पर रहे। उन्होंने अपनी संस्था जीएमआर वारालक्ष्मी फाउंडेशन के जरिये 740 करोड़ रुपये दान दिया। यह संस्था वंचित वर्ग के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी संभालती है। इंफोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणि और उनकी पत्नी रोहिणी नीलेकणि 530 करोड़ रुपये की दानराशि के साथ चौथे स्थान पर रहे।
भारतीय दानवीर सबसे ज्यादा शिक्षा क्षेत्र पर ध्यान दे रहे हैं। बीते साल इस क्षेत्र को कॉरपोरेट जगत ने 12,200 करोड़ रुपये दिए। इसके बाद सामाजिक विकास क्षेत्र को 1,210 करोड़ रुपये, स्वास्थ्य को 1,065 करोड़ रुपये, ग्रामीण विकास को 565 करोड़ और पर्यावरण मामलों को 170 करोड़ रुपये का दान हासिल हुआ। वहीं, कृषि क्षेत्र के विकास पर दानवीरों ने 40 करोड़ रुपये खर्च किए।
-दिग्गज दानदाता-
नाम, कंपनी, राशि
अजीम प्रेमजी, विप्रो, 8,000
शिव नाडर, एचसीएल, 3,000
जीएम राव, जीएमआर, 740
नंदन-रोहिणी नीलेकणि, 530
रोनी स्क्रूवाला, यूटीवी, 470
किरण मजूमदार शॉ, बायोकॉन, 330
रतन टाटा, टाटा समूह, 310
अनिल अग्रवाल, वेदांत समूह, 290
पीएनसी मेनन, शोभा डेवलपर्स, 270
केपी सिंह, डीएलएफ, 200

Source- News in Hindi

Tuesday, 5 November 2013

Euro Zone crisis Bearing Heavy Human toll: OECD

Euro zone

पेरिस। काले धन को लेकर अमीर देशों की कड़ाई का असर एक नए रूप में सामने आ रहा है। स्विस बैंकों में करोड़ों का काला धन छुपाने वाले अब इसकी वापसी की जुगत में लग गए हैं। ऐसे लोग स्विस बैंकों से नकदी निकाल उसे छिपाकर ला रहे हैं। इसकी वजह बना है यूरोपीय देशों और अमेरिका के साथ स्विट्जरलैंड सरकार का करार। काले धन की जन्नत कहा जाने वाला स्विट्जरलैंड प्रमुख देशों के भारी दबाव में इस करार पर दस्तखत करने को मजबूर हुआ। इसके तहत स्विस बैंकों को खुद अपने यहां धन जमा करने वाले के खाते से टैक्स काटकर उसके देश की सरकार को देना होता है। 

इससे बचने के लिए लोग क्या-क्या उपाय आजमा रहे हैं इसका पर्दाफाश फ्रांस, इटली और स्पेन समेत कई यूरोपीय देशों के कस्टम अधिकारियों ने किया है। देखिए, इसका एक नजारा। पेरिस स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर एक कारोबारी ट्रेन का इंतजार कर रहा है। इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है। मगर टैक्स अफसरों की तेज नजर से वह बच नहीं पाया। उन्होंने तलाशी ली तो उसके पास से लिफाफों में भरे 3.5 लाख यूरो निकले। पूछने पर पता चला कि वह बेल्जियम की ट्रेन पकड़ने वाला था। यह रकम जब्त कर ली गई। यूरोपीय संघ के नियमानुसार कोई भी व्यक्ति 10 हजार यूरो से ज्यादा की नकदी अधिकारियों को पूर्व जानकारी दिए बिना लेकर नहीं चल सकता है।
यह कोई अकेला मामला नहीं है। अब बोरिस बॉइलन को ले लीजिए। वह इराक और ट्यूनीशिया में फ्रांसीसी राजदूत रह चुके हैं। उन्हें फ्रांस का लीजन द ऑनर सम्मान भी मिल चुका है। इस साल जुलाई में वह भी अच्छी खासी नकदी के साथ कस्टम अधिकारियों के चंगुल में आ गए। यह रकम उन्होंने अपनी गोपनीयता के लिए कुख्यात स्विस बैंक के खाते से निकाली थी। इसे लेकर वह फ्रांस लौटे थे। मकसद था उनकी काली कमाई पर टैक्स न कटे, और न ही उन पर टैक्स चोरी का दाग लगे।
स्विटजरलैंड से आने वाले कारोबारियों, पेशेवरों और पर्यटकों ही नहीं, राजनयिकों से भी ऐसी रकम की जब्ती आम बात हो गई है। कई बार तो भारत-चीन समेत एशियाई देशों के काले धन को भी ठिकाने लगाने या फिर मनीलांड्रिंग के लिए नकदी को यूरोपीय देशों में ले जाया जा रहा है। नकदी को ले जाने के लिए लगेज, केक बॉक्स, पोटैटो चिप्स बैग से लेकर बच्चों की जेब का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। अक्सर ये 500 यूरो के नोट की गड्डियां होती हैं।
रंग लाई ओईसीडी की कोशिशें
स्विट्जरलैंड की सरकार ने कई देशों के साथ बीते वर्ष तो कुछ के साथ इस साल टैक्स चोरी रोकने की संधि पर हस्ताक्षर किए हैं। हालिया वित्तीय संकट के बाद अमीर देशों का संगठन काले धन के खिलाफ हाथ धोकर पड़ गया था। लोग कर चुकाने के बजाय अपनी काली कमाई स्विस बैंकों समेत कई टैक्स हैवेन में ले जाकर जमा कर रहे थे। इसके खिलाफ ओईसीडी ने लगातार अभियान चलाकर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया। 

अब स्विस बैंकों को अपने यहां धन जमा करने वाले ग्राहकों के खाते से हर साल टैक्स काटकर उनके देशों को सौंपना पड़ रहा है। भारत को भी इस पहल का लाभ मिलना तय है।

Euro Zone Crisis Bearing Heavy Human toll: OECD

Euro zone

पेरिस। काले धन को लेकर अमीर देशों की कड़ाई का असर एक नए रूप में सामने आ रहा है। स्विस बैंकों में करोड़ों का काला धन छुपाने वाले अब इसकी वापसी की जुगत में लग गए हैं। ऐसे लोग स्विस बैंकों से नकदी निकाल उसे छिपाकर ला रहे हैं। इसकी वजह बना है यूरोपीय देशों और अमेरिका के साथ स्विट्जरलैंड सरकार का करार। काले धन की जन्नत कहा जाने वाला स्विट्जरलैंड प्रमुख देशों के भारी दबाव में इस करार पर दस्तखत करने को मजबूर हुआ। इसके तहत स्विस बैंकों को खुद अपने यहां धन जमा करने वाले के खाते से टैक्स काटकर उसके देश की सरकार को देना होता है। 

इससे बचने के लिए लोग क्या-क्या उपाय आजमा रहे हैं इसका पर्दाफाश फ्रांस, इटली और स्पेन समेत कई यूरोपीय देशों के कस्टम अधिकारियों ने किया है। देखिए, इसका एक नजारा। पेरिस स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर एक कारोबारी ट्रेन का इंतजार कर रहा है। इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है। मगर टैक्स अफसरों की तेज नजर से वह बच नहीं पाया। उन्होंने तलाशी ली तो उसके पास से लिफाफों में भरे 3.5 लाख यूरो निकले। पूछने पर पता चला कि वह बेल्जियम की ट्रेन पकड़ने वाला था। यह रकम जब्त कर ली गई। यूरोपीय संघ के नियमानुसार कोई भी व्यक्ति 10 हजार यूरो से ज्यादा की नकदी अधिकारियों को पूर्व जानकारी दिए बिना लेकर नहीं चल सकता है।

यह कोई अकेला मामला नहीं है। अब बोरिस बॉइलन को ले लीजिए। वह इराक और ट्यूनीशिया में फ्रांसीसी राजदूत रह चुके हैं। उन्हें फ्रांस का लीजन द ऑनर सम्मान भी मिल चुका है। इस साल जुलाई में वह भी अच्छी खासी नकदी के साथ कस्टम अधिकारियों के चंगुल में आ गए। यह रकम उन्होंने अपनी गोपनीयता के लिए कुख्यात स्विस बैंक के खाते से निकाली थी। इसे लेकर वह फ्रांस लौटे थे। मकसद था उनकी काली कमाई पर टैक्स न कटे, और न ही उन पर टैक्स चोरी का दाग लगे।
स्विटजरलैंड से आने वाले कारोबारियों, पेशेवरों और पर्यटकों ही नहीं, राजनयिकों से भी ऐसी रकम की जब्ती आम बात हो गई है। कई बार तो भारत-चीन समेत एशियाई देशों के काले धन को भी ठिकाने लगाने या फिर मनीलांड्रिंग के लिए नकदी को यूरोपीय देशों में ले जाया जा रहा है। नकदी को ले जाने के लिए लगेज, केक बॉक्स, पोटैटो चिप्स बैग से लेकर बच्चों की जेब का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। अक्सर ये 500 यूरो के नोट की गड्डियां होती हैं। 

रंग लाई ओईसीडी की कोशिशें
स्विट्जरलैंड की सरकार ने कई देशों के साथ बीते वर्ष तो कुछ के साथ इस साल टैक्स चोरी रोकने की संधि पर हस्ताक्षर किए हैं। हालिया वित्तीय संकट के बाद अमीर देशों का संगठन काले धन के खिलाफ हाथ धोकर पड़ गया था। लोग कर चुकाने के बजाय अपनी काली कमाई स्विस बैंकों समेत कई टैक्स हैवेन में ले जाकर जमा कर रहे थे। इसके खिलाफ ओईसीडी ने लगातार अभियान चलाकर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया। 

अब स्विस बैंकों को अपने यहां धन जमा करने वाले ग्राहकों के खाते से हर साल टैक्स काटकर उनके देशों को सौंपना पड़ रहा है। भारत को भी इस पहल का लाभ मिलना तय है।

Source- News in Hindi