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Monday, 19 January 2015

कर्ज में डूबे पाकिस्तान में पेट्रोल संकट, सड़कों पर उतरे लोग

अभी तक आतंकवाद से जूझ रहा हमारा पड़ोसी देश अब तेल संकट से भी जूझ रहा है। दरअसल पाकिस्तान में पेट्रोल और डीजल खत्म होने की कगार पर है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि कई शहरों के पेट्रोल पंप पर बमुश्किल 24 घंटे का ईंधन बचा है। स्थिति नहीं सुधरी तो कई पेट्रोल पंप सोमवार से बंद भी हो सकते हैं। परेशान लोग सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। इस संकट की वजह से प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने 4 शीर्ष अधिकारियों को बर्खास्त कर दिया है।

पाकिस्तान स्टेट ऑयल (पीएसओ) कंपनी के मुताबिक बीते दो हफ्ते में किसी भी बंदरगाह पर कच्चे तेल का एक भी जहाज नहीं आया है क्योंकि निर्यातकों का 215 अरब रुपया पाकिस्तान पर बकाया है। आमतौर पर हर 15 दिन में देश में छह से आठ जहाज कच्चा तेल पहुंचता है। हर जहाज में 65 हजार टन तेल होता है।

ईंधन की कमी के कारण देशभर में आक्रोश है। पाकिस्तानी समाचार पत्रों के अनुसार, देश के कई बड़े शहरों में पिछले छह दिनों से पेट्रोल पंप बंद पड़े हुए हैं। मुल्तान में नाराज लोगों ने प्रदर्शन किया। डॉन के अनुसार, ईंधन की कमी के कारण आपातकालीन सेवाएं प्रभावित हुई हैं। सार्वजनिक परिवहन भी काफी प्रभावित हुआ है।
देश के कई अखबारों ने देश के बड़े शहरों में पेट्रोल पंपों पर हुईं झड़पों की खबरें प्रकाशित की हैं। जब वाहनों की कतार में खड़े लोगों को बताया गया कि पंप में ईंधन नहीं है तो वे भड़क उठे। डॉन में प्रकाशित खबरों के अनुसार लाहौर, फैसलाबाद, इस्लामाबाद, सियालकोट और मुल्तान में कुछ खुले पेट्रोल पंपों के बाहर कई वाहन चालकों को रातभर कतारों में इंतजार करना पड़ा।

पाक पंजाब के लाहौर और अन्य शहरों में पेट्रोल-डीजल की किल्लत सबसे ज्यादा है। यह नौबत पाक की माली हालत खराब होने की वजह से आई है। यहां सरकारी कंपनियां या तो घाटे में है या फिर नकदी के संकट से जूझ रही हैं। पाक में कुछ महीने पहले तक एक दिन में 11 हजार टन ईंधन बिकता था। यह बढ़कर 15 हजार टन प्रतिदिन हो गया है। एक अनुमान के मुताबिक पिछले कुछ दिनों में पेट्रोल-डीजल की मांग में 23 फीसद की ग्रोथ हुई है। हर महीने पाक में औसतन 3.80 लाख टन पेट्रोल-डीजल की दरकार होती है।

इसमें से 1.40 लाख टन तो रिफाइनरीज से आता है। 2.40 लाख टन आयात होता है। पाक स्टेट ऑयल की पाक के तेल बाजार में हिस्सेदारी 65 फीसद है। वह हर साल 1200 अरब रुपये का व्यवसाय करती है। वहीं पाक अरब रिफाइनरी भी 20 फीसद की हिस्सेदारी रखती है। यह रिफाइनरी पिछले कुछ दिनों से बिजली आपूर्ति विफल हो जाने से काम नहीं कर रही है।

Wednesday, 7 January 2015

पाक ने लाहौर-नई दिल्‍ली बस सेवा को वाघा तक किया सीमित

आतंकी हमले की आशंका के मद्देनजर पाकिस्तान ने लाहौर से नई दिल्ली के बीच चल रही बसों को अब वाघा सीमा तक ही सीमित रखने का फैसला किया है।

समाचारपत्र 'डॉन' की रिपोर्ट के अनुसार, नई दिल्ली जा रहे और वहां से लौट रहे यात्रियों को वाघा सीमा पर ही उतारा जा रहा है। भारत जाने वालों को भी वाघा सीमा से बस पकड़ने के लिए कहा गया है। वाघा सीमा भारतीय राज्य पंजाब के अमृतसर शहर और पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित लाहौर के बीच में है।

पाकिस्तान-भारत दोस्ती बस सेवा का यह नया तरीका पाकिस्तान पर्यटन विकास निगम (पीटीडीसी) के अधिकारियों द्वारा बस का संचालन सीमा पर स्थित अपने उप-कार्यालय में स्थानांतरित किए जाने के बाद शुरू हुआ है।

गुलबर्ग में पीटीडीसी द्वारा नियुक्त सुरक्षा अधिकारी अकरम ने कहा कि पूरा बस संचालन सीमा पर से किया गया है। पाकिस्तान-भारत के बीच इस बस सेवा की आधिकारिक शुरुआत 16 मार्च, 1999 को हुई थी।

Tuesday, 5 November 2013

Folk singer Reshma famous in Pakistan and Indian film Industry

रेशमा तो इस जहान से रुखसत हो गईं। रह गईं उनकी बातें और जादू बिखेरने वाले उनके नगमे। आइए नजर डालते हैं उनके दिल से जुबां पर आए कुछ लब्ज जो कम ही लोगों को मालूम हैं:
- पाकिस्तान में भौंडे गीतों की होड़ है, गायक अश्लीलता परोस रहे हैं, मुझे कोई करोड़ रुपये दे तो भी न ऐसा गीत गाऊं।
- नौशाद मेरे गुरु हैं, मैं उनकी पूजा करती हूं।
- मैं तो अनपढ़ हूं, मैं क्या जानूं नए संगीत की बातें। 

लंबी जुदाई से मिली पहचान
बॉलीवुड के फिल्म निर्माता सुभाष घई की फिल्म हीरो में गाए गीत 'लंबी जुदाई' से चमकी रेशमा ने भारत में कुल 103 कार्यक्रम दिए। कला व थिएटर के कद्रदान व प्रमोटर डॉ. एसके पूनिया ने तीन दशक तक रेशमा के प्रोग्राम अरेंज करवाए। 

शादी में आने के मिलते थे 5 लाख
डॉ. एसके पूनिया (16, पंचकूला) ने कहा कि रेशमां की शोहरत का अंदाजा इसी से लग जाता है कि उन दिनों शादी में आने और गाने के वह 5 लाख रुपये लेती थी मगर अपने भतीजे भवेश की शादी में उसने कुछ लेना तो दूर उल्टा सभी रस्में निभाईं, शगुन भी दिया। दो घंटे सिर्फ और सिर्फ बधाइयां गाईं सो अलग। मैं अपनी बहन का यह प्यार-दुलार कभी नहीं भूल सकता।

Monday, 4 November 2013

Legendary Pakistani Folk Singer Reshma

Legendary Pakistani Folk Singer Reshma
[नवनीत शर्मा]
प्रसिद्ध पाकिस्तानी लोक गायिका रेशमा के निधन के साथ ही एक सशक्त लोक स्वर हमसे बिछड़ गया। 66 वर्षीय रेशमा का रविवार को लाहौर में निधन हो गया। वह लंबे समय से गले के कैंसर से पीड़ित थीं। दमादम मस्त कलंदर और लंबी जुदाई जैसे गीतों की अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति से उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप के संगीत प्रेमियों को मंत्रमुग्ध कर दिया था। रेशमा का जन्म राजस्थान में बीकानेर में बंजारा परिवार में हुआ था।
लोक स्वर ऐसा जिसे सुनते हुए राजस्थान के रेगिस्तान की खुरदराहट और बंजारों की रगों में दौड़ती मस्ती पूरी शिद्दत से महसूस होती थी। ज्यादातर भारतीयों के लिए रेशमा से परिचय का अर्थ फिल्म 'हीरो' के गीत, चार दिनां दा प्यार हो रब्बा बड़ी लंबी जुदाई.. से है, लेकिन रेशमा ने जब-जब और जो भी गाया वह पूरे दिल से गाया। यह बख्शीश लोक से सींचे जाने पर ही मिलती है कि मंदर सप्तक से लेकर तार सप्तक तक रेशमा की आवाज में कहीं कोई टूटन नहीं आती। हाय ओ रब्बा नइयो लगदा दिल मेरा.. जैसा गीत गाकर वह हमारे अंदर छिपी हुई शाश्वत उदासी को धीरे-धीरे जगाते हुए मंझे हुए मनोवैज्ञानिक की तरह बाहर ले आती हैं। लोग इसे आज भी याद करते हैं कि पाकिस्तान के ही मशहूर गायक रहे और मेहदी हसन के शिष्य परवेज़ मेहदी के साथ गाया उनका गाना, गोरिए, मैं जाणा परदेस.. में किस तरह रेशमा की सुरीली हूंक परवेज की हरकतों और मुर्कियों पर भारी पड़ी थी। उनकी जवानी से लेकर बुढ़ापे के दौर तक में उनके साक्षात्कारों में एक साफगोई और अविरल विचार प्रवाह हमेशा नजर आया। उर्दू और पंजाबी के मिश्रण में बात करते हुए रेशमा ने कभी नहीं छुपाया कि वह पढ़ी-लिखी नहीं हैं और भाषा पर उनका कोई अधिकार नहीं है। न रेशमाजी ने वे अदाएं सीखीं जो नए लोग तब भी सीख लेते हैं जब उन्हें संगीत की सही समझ न हो। साक्षात्कार लेने वाले को वह कभी बाबू साहब, कभी बाबू तो कभी बेटा कह कर ही संबोधित करती थीं।

भारत का जिक्र आते ही वह उस सम्मान के बारे में जरूर बात करती थीं जो उन्हें यहां मिला। स्टूडियो में जाने से घबराने वाली रेशमाजी के अनुरोध पर लंबी जुदाई गाना दिलीप कुमार के घर पर रिकॉर्ड हुआ था। वे उन चंद पाकिस्तानी कलाकारों में थीं जिन्हें पाकिस्तान ने समझा और कद्र भी की। उन्हें कॉमेडियन बब्बू बराल और गजल गायक मेहदी हसन जैसे फनकारों की तरह इलाज के लिए गिड़गिड़ाना नहीं पड़ा। यह कहना हालांकि बहुत रवायती होगा, लेकिन सच यही है कि सांस्कृतिक संदर्भो में रेशमा भारत और पाकिस्तान के बीच एक पुल की तरह थीं।

राजस्थान में बसा रेशमा का बंजारा परिवार विभाजन के दौरान कराची चला गया था। उन्हें होश संभालने पर भारत और राजस्थान का पता चला होगा तो शायद न चाहते हुए भी उदासी के साथ एक रिश्ता कायम हो गया होगा। इस बात की पुष्टि उन्होंने अपने कई साक्षात्कारों में की। रेशमा की आवाज में कोई चुलबुला गीत सुन कर ऐसी चुलबुलाहट महसूस होती है जो घोर उदासी के बाद आती है। ऐसा उनके गीत, मेरी हमजोलियां, कुछ यहां कुछ वहां.. को सुनते हुए महसूस किया जा सकता है। रेशमा की यह खूबी रही कि वह उस कराची में रहकर भी अपनी संवेदनशीलता बरकरार रख पाई, जिसके बारे में मुश्ताक अहमद यूसुफी ने लिखा था, 'यहां के मच्छर डीटीटी से नहीं, कव्वालों की तालियों से मरते हैं।'

Source- News in Hindi