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Thursday, 30 June 2016

अब मुश्किल में चीन, NSG पर भारत के खिलाफ दांव पड़ सकता है उल्टा

कहते हैं कि राजनीति और कूटनीति में समय का बहुत ज्यादा महत्व होता है। जो फैसला आप के पक्ष में न हो इसका मतलब ये नहीं है कि आप उम्मीद छोड़ दें। 24 जून को सियोल बैठक में एनएसजी में भारत की दावेदारी पर चीन की चाल कामयाब हुई। लेकिन चीन अब मुश्किलों में है। उसकी मुश्किल के पीछे कई वजह हैं। जिसे क्रमवार जानने को कोशिश करते हैं।

सियोल में चीन के मुख्य वार्ताकार वैन कून ने चीनी शासन को भरोसा दिलाया था कि 48 सदस्यों वाले एनएसजी के एक तिहाई सदस्य चीन का समर्थन करेंगे। लेकिन वैन कून की रणनीति और कूटनीति औंधे मुंह गिर गई। चीन समेत महज चार देशों ने भारत की दावेदारी का विरोध किया। जानकारों का कहना है कि सियोल के परिणाम से भारत को जितनी निराशा हुई हो, उससे कम धक्का चीन को भी नहीं लगा। चीन को यकीन था कि कम से कम 15 देश उसका समर्थन करेंगे।

चीन को ये सब इतना नागवार लगा कि उसने मुख्य वार्ताकार वैन कून की सार्वजनिक तौर फटकार लगा डाली। चीन प्रशासन वैन कून की रणनीति पर सवाल उठाता रहा।

साउथ चीन सागर पर चीन की मुश्किल

साउथ चीन सागर के मुद्दे पर चीनी रणनीतिकार मुश्किल में हैं। बताया जा रहा है कि इस मुद्दे पर हेग आरबिट्रेशन से कुछ दिनों में फैसला आ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि ये फैसला चीन के खिलाफ जा सकता है। आरबिट्रेशन कोर्ट फिलीपींस के समर्थन में फैसला सुना सकता है। कोर्ट के फैसले का मतलब ये होगा कि फिलीपींस की हड़पी गयी जमीन को चीन को वापस करना होगा। इस फैसले का इससे भी बड़ा असर ये होगा कि चीन युनाइटेड कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ सी से बाहर हो सकता है जिसका वो सदस्य है।

भारत के पास है मौका

चीन को इस बात का डर है कि आरबिट्रेशन कोर्ट के फैसले के बाद भारत वही दांव खेल सकता है। जिसे चीन ने सियोल मीटिंग के दौरान किया था। जानकारों का कहना है कि हेग फैसले का हवाला देकर भारत, चीन को अकंलास से बाहर करने का दबाव बना सकता है। भारत को इस मुद्दे पर समर्थन जुटाने में मुश्किल भी नहीं आएगी। चीन का कहना है कि उसे 60 देशों का समर्थन हासिल है जो ये मानते हैं कि हेग आरबिट्रेशन अवैध है।

पश्चिमी देशों का भी मानना है कि साउश चीन सी के मुद्दे पर चीन को अलग-थलग होने का डर सता रहा है। चीन हेग आरबिट्रेशन के फैसले का इंतजार कर रहा है। हालांकि चीनी रणनीतिकार उनके हित में आड़े आने वाले कानूनों की वैधता पर ही सवाल उठा देते हैं। इसके उलट अगर अवैध कानून उसके हित को साधने में मदद देते हैं, तो चीन उन कानूनों को वैध बताने में गुरेज भी नहीं करता है।

Tuesday, 28 June 2016

MTCR में भारत की कामयाबी पर भड़का चीन, भारतीयों को बताया पाखंडी

चीन अपने आप को भारत का दोस्त कहता है, लेकिन हकीकत में उसकी सोच कुछ और होती है। एनएसजी में भारत की दावेदारी पर उसने गोलमोल जवाब दिया कि उसे किसी तरह की दिक्कत नहीं है। लेकिन नियम-कानून से इतर भारत का समर्थन वो कैसे कर सकता है। एनएसजी में दावेदारी न मिलने से निराश भारतीयों में उत्साह का संचार हुआ जब मिसाइल तकनीक नियंत्रण समूह का भारत पूर्ण सदस्य़ बन गया । लेकिन चीन की सरकारी न्यूज एजेंसी को ये सब अच्छा नहीं लगा। ग्लोबल टाइम्स ने एडिटोरियल में भारतीयों को स्वार्थी, पाखंडी और अनैतिक करार दिया।

ग्लोबल टाइम्स के संपादकीय में ये भी कहा गया है कि भारतीयों में राष्ट्रवाद की कमी है। वे पश्चिमी देशों के बीच भागकर खुद का नुकसान कर रहे हैं। एनएसजी पर मिली नाकामी पर भारतीय मीडिया और राजनेता चीन को कोस रहे हैं। लेकिन वे अपनी कमी पर ध्यान नहीं दे रहे हैं।


पेपर में कहा गया है कि ये बात समझ के बाहर है कि अमेरिका के पीछे भारत क्यों भाग रहा है। अमेरिकी ही पूरा विश्व नहीं है। अगर अमेरिका अब भारत की तरफदारी कर रहा है तो इसका अर्थ ये नही है कि पूरा विश्व भारत का समर्थन करेगा। हकीकत ये है कि भारत के प्रति अमेरिकी विदेश नीति सिर्फ और सिर्फ चीन को नियंत्रित करने की है। भारतीयों को राष्ट्रवाद को समझने और सीखने की जरुरत है।

भारतीयों को खुद से व्यवहार को सीखने की जरुरत है। एक तरफ आप सुपर पावर बनने का सपना देखते हैं। तो ये समझना होगा कि सुपर पावर अपनी शर्तों पर नीतियों को प्रभावित करते हैं। चीन नियमों को तरजीह देता है। नियम ये है कि एनएसजी में दावेदारी के लिए एनपीटी पर हस्ताक्षर होने चाहिए। चीन ने सिर्फ नियमों का हवाला दिया था। इस मुद्दे पर भारत की तरफ से बेवजह की टिप्पणी की जा रही है। 

Tuesday, 21 June 2016

भारत के चलते बना था NSG, अब सदस्यता के लिए करनी पड़ रही है मशक्कत

जिस एनएसजी (न्यूक्लियर सप्लाई ग्रुप) में शामिल होने के लिए इतनी मशक्कत कर रहा है क्या आपको पता है कि वह भारत की वजह से ही कभी अस्तित्व में आया था। यह सुनकर आपको जरूर आश्चर्य होगा लेकिन यह सच है। दरअसल न्यूक्लियर सप्लाई ग्रुप के अस्तित्व में आने के पीछे थी भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी। इंदिरा गांधी के सत्ता में रहते हुए ही भारत ने पहली बार वर्ष 1974 में परमाणु परीक्षण किया था। इस पूरे मिशन का कोडवर्ड था 'बुद्धा स्माइल'।

यह परीक्षण दुनिया के कई मुल्कों को नागवार गुजरा कि उन्होंने इसके खिलाफ एक ग्रुप बना लिया, इसका ही नाम न्यूक्लियर सप्लाई ग्रुप दिया गया। भारत के परमाणु परीक्षण के बाद नवंबर 1975 में पहली बार कुछ देशों की बैठक हुई। इस बैठक में भारत के परमाणु परीक्षण की आलोचना की गई और ऐसा दोबारा न करने की चेतावनी भी गई। इसके अलावा अन्य देश इस दिशा में कोई कदम न बढ़ाए इसके लिए भी इस बैठक में चर्चा की गई। इस दौरान 1975 से लेकर 1978 बैठकों का लंबा दौर चला।

इन तमाम बैठकों के बाद कुछ एग्रीमेंट और कुछ गाइडलाइंस सामने आई। कुछ चीजों की ऐसी सूची भी बनाई गई जिसको एक्सपोर्ट किया जा सकता है, लेकिन यह केवल उन्हीं देशों को बेची जा सकती थीं जो इस श्रेणी या एनएसीजी में शामिल नहीं थे। एनएसजी से पहले इसका नाम लंदन सप्लाई ग्रुप था। इसके अलावा इसको लंदन ग्रुप के नाम से भी जाना जाता था। वर्ष 1978 के बाद 1991 तक इस ग्रुप की दोबारा कोई बैठक ही नहीं हुई।

ताज्जुब की बात यह है कि जिस भारत की वजह से यह अस्तित्व में आया आज वही इसका हिस्सा नहींं है। आपको यह सुनकर भी आश्चर्य होगा कि इसमें ज्यादातर देश यूरोप के हैं। कुछ तो इतने छोटे देश इस ग्रुप का हिस्सा हैंं जिसको सुनकर आपको शायद विश्वास भी न हो।  Read more http://www.jagran.com/